अपनी जिंदगी को कुछ इस तरह देखता हूँ
खुद अपनी चिता पे बैठ कर हाथ सेकता हूँ
मर गया था मैं उस दिन जब दूर तुमसे हुआ
तब से ही जीने की झूठी आस देखता हूँ
मेरे सपने मेरे अरमान मेरा यकीन-ए-दुआ
सब जल के हो गयी हैं आज राख देखता हूँ
वाह रे काम दो कौड़ी का यहाँ लाख कमाई है
उल्लुओं पे होती हुई पैसे की बरसात देखता हूँ
क़ैद कब तलक रखोगे मुझे रहनुमाओ मेरे
बस पलक के फ़ासले पे खुद को आज़ाद देखता हूँ
अब कोई और गुज़ारिश नही फरियाद नही करनी
नही तुम्हारी भी यहाँ कोई औकात देखता हूँ
ये तो सच है की बड़ा गुस्ताख हूँ मैं,
तुम बे-दिलों को कहाँ सुनते हुए फरियाद देखता हूँ
बुधवार, 29 जुलाई 2009
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