शनिवार, 7 मार्च 2015

रिश्ते ...

रिश्ते तल्ख़ इतने हो न जाएँ ,
जिगर को फ़ूकें, ज़ुबान जलाएँ |
ये धार शब्दों की काटती है,
भाई से भाई, बेटों से माएँ | 1 |

है बात कुछ जो, चुभी है गहरी,
मगर पीर दिल की, किसे सुनाएँ |
यहाँ सारे चेहरे, हैं अजनबी से,
कुछ किससे पूछें, किसे बताएँ |2 |

लगी थी ठोकर , संभल गया पर,
थी मेरे पीछे, बड़ी दुआएँ |
दूर होकर भी, करीब रहना,
अजनबी लगें न, नज़र जब मिलाएँ |3|

बहुत से क़िस्से हैं खट्टे मीठे ,
कभी हंसाएँ, कभी रुलाएँ |
बड़ा ही मुश्किल ये फ़ैसला है
किसे याद रखें , किसे भुलाएँ |4|

अलग सा चैन-ओ-अमन यहाँ है,
इस शहर की हैं अलग अदाएँ |
मिट्टी है घर की, अलग महक है,
अलग है रंगत , अलग हवाएँ  |5|


शुक्रवार, 6 मार्च 2015

लोग आसमाँ को ..

लोग आसमाँ को रात भर जाग देखते हैं !
कुछ चाँद देखते हैं कुछ दाग देखते हैं !!
खुद जल चुके  हैं जो ज़िंदगी  में कभी  !
दूसरों  के घरों में लगा के आग देखते हैं !!
खुद रंगों से बचकर  भागते हैं जो !
छिप कर खिड़कियों से गलियों की फाग देखते हैं !!
दूसरों  का तमाशा बनाकर होते हैं खुश !
आस्तीनों के अक्सर वो बनकर नाग देखते हैं !!
रोशनी नही होती जिनके घरों में !
जलाने के लिए वो चिराग देखते हैं !!
वो लोग जो महशूर हैं उजाड़ने के लिए !
 फूले के लिए दूसरों के बाग देखते हैं  !!