शरारतों का था जिसका बचपन
आज बनी है वो दुल्हन,
सूना कर जाएगी ये आँगन,
पहना देगा कोई कंगन ||
वो घर से विदा हो जाएगी
पर न हमसे जुदा हो पाएगी
श्री-सिद्धि-हर्ष मिले,
है आशीष हमारा तू फूले फले ||
बहुत कुछ को बहुत कम मे समेटने की कोशिश रहती है हर किसी की ...ऐसी ही कोशिश हमेशा से मैं भी करता रहा हूँ !
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