शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

ग़ज़ल १

बेसबात साथ की तासीर कुछ नहीं  
न रखो वो असास जिसकी तामीर कुछ नहीं  


 नहीं देखा कभी , बस उसके बारे में सुना है 
एक नज़ारा तो है वो उसकी तस्वीर कुछ नहीं  


कहते है दुनिया बुरी है यही दुनियावाले  
जो तू है तो दुनिया में और काफ़िर कुछ नहीं  


मेरी परवाज़ से उँचे लगते है तेरे महल  
तुझे पा संकू ऐसी मेरी तकदीर कुछ नहीं  


तेरे दर पे आउँ कभी तो कह ना देना  
तेरी खातिर घर में ए फकीर कुछ नहीं  


सज़ाएं यू ही नहीं मिलती बेबात किसी को  
जुर्म हुआ है मगर गुनाह-ए-असीर कुछ नहीं  
 
* असीर : जो क़ैद मे है, कैदी, बंदी


सोमवार, 14 सितंबर 2009

हिन्दी दिवस



ए ज़बान-ए-आम हिन्दी, तू भी क्या जबां हैं !
हम ढूँढते हैं तेरा वजूद तू कहाँ है !!

तुझमे भी मिलावट हो गयी हिन्दी !
मिलावट बिना कोई चीज़ मिलती ही कहाँ है !!

अँग्रेज़ी के बोझ तले दब गयी तू हिन्दी !
बेघर सी घूमती है तेरा आसरा ही कहाँ है !!

तू वो शमा है जो बुझ नही सकती !
तेरी जगह ले सके कोई ऐसी भाषा ही कहाँ है !!

तू दरिया नही समंदर है हिन्दी ...
समंदर मे ला दे जो उफान वो बरसात कहाँ है ?

अपना ही वजूद ढूँढती फिर रही तू हिन्दी !
मैं भी साथ हू तेरे तू ढूँढ तेरा वजूद कहाँ है !!

एक बार तू मेरी रगों मे भी देख ले !
मिल जाएगा तुझे तेरा वजूद यहाँ है !!

सोमवार, 7 सितंबर 2009

चाहा बहुत समेटू पल मे

जीवन क्या एक कठिन परीक्षा
पग पग देता जीवन शिक्षा !
समेटकर एक पल में जीवन
करना चाहा बहुत समीक्षा !!
इस जीवन को जी लेने की
चाह मचल कर रह जाती है !!!
दर्द बहुत होता है लेकिन
आह निकल कर रह जाती है !!!!

मन मे है बिखराव अजब सा
अंदर है टकराव बहुत अजब सा !
मगर नही दिखता चेहरे पर
ऐसा कोई भाव अजब सा !!
आखें नही छुपाती कुछ भी
भाव बदल कर कह जाती है !!!
दर्द बहुत होता है लेकिन
आह निकल कर रह जाती है !!!!

अपने सिक्के मे खोट पायी है
बैरी अपना स्वयं भाई है !
घाव नहीं दिखता है लेकिन
अंदर चोट कही खाई है !!
पानी की जो बूँद सहेजू
राह बदल कर बह जाती है !!!
दर्द बहुत होता है लेकिन
आह निकल कर रह जाती है !!!!