ए ज़बान-ए-आम हिन्दी, तू भी क्या जबां हैं !
हम ढूँढते हैं तेरा वजूद तू कहाँ है !!
तुझमे भी मिलावट हो गयी हिन्दी !
मिलावट बिना कोई चीज़ मिलती ही कहाँ है !!
अँग्रेज़ी के बोझ तले दब गयी तू हिन्दी !
बेघर सी घूमती है तेरा आसरा ही कहाँ है !!
तू वो शमा है जो बुझ नही सकती !
तेरी जगह ले सके कोई ऐसी भाषा ही कहाँ है !!
तू दरिया नही समंदर है हिन्दी ...
समंदर मे ला दे जो उफान वो बरसात कहाँ है ?
अपना ही वजूद ढूँढती फिर रही तू हिन्दी !
मैं भी साथ हू तेरे तू ढूँढ तेरा वजूद कहाँ है !!
एक बार तू मेरी रगों मे भी देख ले !
मिल जाएगा तुझे तेरा वजूद यहाँ है !!
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