सोमवार, 14 सितंबर 2009

हिन्दी दिवस



ए ज़बान-ए-आम हिन्दी, तू भी क्या जबां हैं !
हम ढूँढते हैं तेरा वजूद तू कहाँ है !!

तुझमे भी मिलावट हो गयी हिन्दी !
मिलावट बिना कोई चीज़ मिलती ही कहाँ है !!

अँग्रेज़ी के बोझ तले दब गयी तू हिन्दी !
बेघर सी घूमती है तेरा आसरा ही कहाँ है !!

तू वो शमा है जो बुझ नही सकती !
तेरी जगह ले सके कोई ऐसी भाषा ही कहाँ है !!

तू दरिया नही समंदर है हिन्दी ...
समंदर मे ला दे जो उफान वो बरसात कहाँ है ?

अपना ही वजूद ढूँढती फिर रही तू हिन्दी !
मैं भी साथ हू तेरे तू ढूँढ तेरा वजूद कहाँ है !!

एक बार तू मेरी रगों मे भी देख ले !
मिल जाएगा तुझे तेरा वजूद यहाँ है !!

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