शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

ग़ज़ल १

बेसबात साथ की तासीर कुछ नहीं  
न रखो वो असास जिसकी तामीर कुछ नहीं  


 नहीं देखा कभी , बस उसके बारे में सुना है 
एक नज़ारा तो है वो उसकी तस्वीर कुछ नहीं  


कहते है दुनिया बुरी है यही दुनियावाले  
जो तू है तो दुनिया में और काफ़िर कुछ नहीं  


मेरी परवाज़ से उँचे लगते है तेरे महल  
तुझे पा संकू ऐसी मेरी तकदीर कुछ नहीं  


तेरे दर पे आउँ कभी तो कह ना देना  
तेरी खातिर घर में ए फकीर कुछ नहीं  


सज़ाएं यू ही नहीं मिलती बेबात किसी को  
जुर्म हुआ है मगर गुनाह-ए-असीर कुछ नहीं  
 
* असीर : जो क़ैद मे है, कैदी, बंदी


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें