पकी फसल थी
स्वप्न महल था
एक अड़ंगा अड़ गया
फसल पर तुषार पड़ गया
जीवन-गणित फिर बिगड़ गया
आम पका और सड़ गया
तुषार पड़ गया
सदमे से अकड़ गया
वो जिंदगी रगड़ गया
तुषार पड़ गया
यूँ पलट के वो पड़ा
'सूजन' आई बिगड़ गया
तुषार पड़ गया
खाई कसम राम की
और राम को झूठा कहा
इस तरह से सबकी वो
नज़र-वज़र से झड़ गया
उसकी अक्ल पर तो फिर
तुषार पड़ गया
बुधवार, 17 जून 2009
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