कुछ भी नही बोलते क्यू चुप हो?
ये मंच तुम्हारा है तुम बोलो..
जो कुछ भी मन मे चलता हो
बात रखो तुम अपनी, कुछ बोलो
कुछ भी नही बोलते, क्यू चुप हो?
है कोई भी तकलीफ़ तो बोलो
ना हो कोई बात तो बोलो
बस बोलो, है यह मंच तुम्हारा
कुछ सुनना है तुमसे, बस कुछ बोलो
कुछ भी नही बोलते, क्यू चुप हो?
एहसान ये मानो तुमको मंच दिया है
कुछ तो होगी तकलीफ़ तुम्हे भी
कोई बात तो होगी तुम्हे सताती
हर्ज़ ही क्या है खुल कर बोलो
कुछ भी नही बोलते, क्यू चुप हो?
बुधवार, 17 जून 2009
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