कारगिल युद्ध हो चुका था, लेकिन उसके बाद के परिणाम कई वर्षों तक चलते रहे !
अटल जी ने बहुत कोशिश की शांति बनाए रखने की, लेकिन उस समय युवा मन को
दर्शाती हुई ये कविता २००३ मे उन खबरों से प्रेरित रही जिनमे अटल जी अपने
विदेश दौरों पर पाकिस्तान के राष्ट्रप्रमुख से बात नही करते और यहाँ भारतीय मीडिया इस पर
खुश होती थी !! युवा तब भी और आज भी आर पार की बात करना चाहते हैं लेकिन
सरकारें ना जाने क्यों आर पार की बात से हमेशा से डरती रही हैं !!
कविता आज भी सार्थक लगती है !!
...
घर मे जंग हो रही,
मृत्यु दंग हो रही,
क्यूँ ये ज़ुल्म सह रहे,
किस कड़ी से कर बँधे,
क्यूँ चले ये बात-बात,
क्यूँ सहें ये घात-घात,
और न विचार हो,
बात आर पार हो !!
जंग नही हो रही,
तो और क्या ये हो रहा,
"हम जंग न होने देंगे"
आपने ये क्यूँ कहा?
मौत है कदम कदम,
गोली कहीं, कहीं बम,
पुनः कोई वार हो,
बात आर पार हो !!
उनकी तरफ न देख कर,
शब्द-बान फेक कर,
मिले नही, न बात की,
खुशी की बात क्या हुई?
शिकायतें क्या कर रहे,
बातों के शेर बन रहे,
ये न अब प्रचार हो,
बात आर पार हो !!
गोधरा मे जो जली,
चिता मे शांति श्यामली,
अहमदाबाद रंग गया,
कौन कहाँ टॅंग गया,
और मंदिरों में भी,
भय का ही प्रवास है,
फिर न अबकी बार हो,
बात आर पार हो !!
लड़कर बचाएँगे किसे?
जब न बचेगा कोई,
इतने सब को देख कर,
ज़रूर हँसेगा कोई,
और क्या बचा रहा,
एक पल भी जो रुके,
अब न इंतेज़ार हो,
बात आर पार हो !!
टूटने को वो हुआ,
बाँध सब्र का बना,
टूट न सका मगर,
किस चीज़ का है ये बना,
अब तो बाँध तोड़ दो,
मुक्त नीर छोड दो,
शत्रु तार तार हो ,
बात आर पार हो !!
और अब सहें नहीं
डर के अब रहें नही,
कदम कदम पे मर रहे,
साँस लेते डर रहे,
बोझ जिंदगी हुई,
घृणा से दबी हुई,
चीख न पुकार हो,
बात आर पार हो !!
मुक्ति भय से पा सकें,
उन्मुक्त गीत गा सकें,
मंदिरों की घंटियाँ,
मस्ज़िदों मे हो अज़ान,
बंद मृत्यु द्वार हो,
युद्ध एक बार हो,
छिप के न प्रहार हो,
बात आर पार हो !!
--- Ajay Chandel
अटल जी ने बहुत कोशिश की शांति बनाए रखने की, लेकिन उस समय युवा मन को
दर्शाती हुई ये कविता २००३ मे उन खबरों से प्रेरित रही जिनमे अटल जी अपने
विदेश दौरों पर पाकिस्तान के राष्ट्रप्रमुख से बात नही करते और यहाँ भारतीय मीडिया इस पर
खुश होती थी !! युवा तब भी और आज भी आर पार की बात करना चाहते हैं लेकिन
सरकारें ना जाने क्यों आर पार की बात से हमेशा से डरती रही हैं !!
कविता आज भी सार्थक लगती है !!
...
घर मे जंग हो रही,
मृत्यु दंग हो रही,
क्यूँ ये ज़ुल्म सह रहे,
किस कड़ी से कर बँधे,
क्यूँ चले ये बात-बात,
क्यूँ सहें ये घात-घात,
और न विचार हो,
बात आर पार हो !!
जंग नही हो रही,
तो और क्या ये हो रहा,
"हम जंग न होने देंगे"
आपने ये क्यूँ कहा?
मौत है कदम कदम,
गोली कहीं, कहीं बम,
पुनः कोई वार हो,
बात आर पार हो !!
उनकी तरफ न देख कर,
शब्द-बान फेक कर,
मिले नही, न बात की,
खुशी की बात क्या हुई?
शिकायतें क्या कर रहे,
बातों के शेर बन रहे,
ये न अब प्रचार हो,
बात आर पार हो !!
गोधरा मे जो जली,
चिता मे शांति श्यामली,
अहमदाबाद रंग गया,
कौन कहाँ टॅंग गया,
और मंदिरों में भी,
भय का ही प्रवास है,
फिर न अबकी बार हो,
बात आर पार हो !!
लड़कर बचाएँगे किसे?
जब न बचेगा कोई,
इतने सब को देख कर,
ज़रूर हँसेगा कोई,
और क्या बचा रहा,
एक पल भी जो रुके,
अब न इंतेज़ार हो,
बात आर पार हो !!
टूटने को वो हुआ,
बाँध सब्र का बना,
टूट न सका मगर,
किस चीज़ का है ये बना,
अब तो बाँध तोड़ दो,
मुक्त नीर छोड दो,
शत्रु तार तार हो ,
बात आर पार हो !!
और अब सहें नहीं
डर के अब रहें नही,
कदम कदम पे मर रहे,
साँस लेते डर रहे,
बोझ जिंदगी हुई,
घृणा से दबी हुई,
चीख न पुकार हो,
बात आर पार हो !!
मुक्ति भय से पा सकें,
उन्मुक्त गीत गा सकें,
मंदिरों की घंटियाँ,
मस्ज़िदों मे हो अज़ान,
बंद मृत्यु द्वार हो,
युद्ध एक बार हो,
छिप के न प्रहार हो,
बात आर पार हो !!
--- Ajay Chandel
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