जाने क्यूँ जब, सुबह उठा तो,
मेरे दिल को बात -
आज ये बहुत कचोटी |
बहुत दिनों से, मिली नही है,
तेरे हाथ की, दाल,
दाल मे सोंधी रोटी | 1 |
चन्द हरे पत्तों की खातिर,
दूर रहा करता हूँ,
अपने ही घर जाने से -
मजबूर रहा करता हूँ,
याद बहुत आती हैं घर की,
बातें छोटी छोटी | 2 |
अपने ही घर में मुझको तुम,
मेहमान बना देती हो,
जब भी घर आता हूँ,
पकवान बना देती हो,
सात तरह की सब्जी-पूड़ी,
मीठा बारह कोटि | 3 |
अब भी अच्छा लगता है,
मुझको कथरी पर सोना,
भाता नहीं, मुझे नया ये,
मोटा-नर्म बिछौना,
और बिछाना उसपर, घर की,
चादर सबसे मोटी | 4 |
आपा-धापी दौड़ भाग से,
थक कर सो जाता हूँ,
तुमसे बात नही हो पाती,
भूल भी मैं जाता हूँ,
घर की याद दिलाने वाली,
आती हैं तब बर्रोटी | 5 |
अपना भी घर बना लिया है,
कहने को इन मीनारों में,
रंग करा रखा है सबसे -
महँगा चार दीवारों में,
लेकिन चैन वही देती है,
अपनी छोटी सी ओटी | 6 |
*कथरी : पुराने कपड़ों से बनाया गया बिस्तर
*बर्रोटी : दुःस्वप्न
*ओटी: आँगन / पोर्च
*कोटि : तरह
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