सोमवार, 7 सितंबर 2009

चाहा बहुत समेटू पल मे

जीवन क्या एक कठिन परीक्षा
पग पग देता जीवन शिक्षा !
समेटकर एक पल में जीवन
करना चाहा बहुत समीक्षा !!
इस जीवन को जी लेने की
चाह मचल कर रह जाती है !!!
दर्द बहुत होता है लेकिन
आह निकल कर रह जाती है !!!!

मन मे है बिखराव अजब सा
अंदर है टकराव बहुत अजब सा !
मगर नही दिखता चेहरे पर
ऐसा कोई भाव अजब सा !!
आखें नही छुपाती कुछ भी
भाव बदल कर कह जाती है !!!
दर्द बहुत होता है लेकिन
आह निकल कर रह जाती है !!!!

अपने सिक्के मे खोट पायी है
बैरी अपना स्वयं भाई है !
घाव नहीं दिखता है लेकिन
अंदर चोट कही खाई है !!
पानी की जो बूँद सहेजू
राह बदल कर बह जाती है !!!
दर्द बहुत होता है लेकिन
आह निकल कर रह जाती है !!!!

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना. अपने अहसासों का सुन्दर प्रस्तुतीकरण. बहुत अच्छा.. आगे लिखते रहें
    - सुलभ ( (यादों का इन्द्रजाल..)

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  2. बहुत हीं सुन्दर भाव है कविता के ।

    चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

    गुलमोहर का फूल

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत हीं सुन्दर भाव है कविता के ।

    चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी
    शुभकामनायें.

    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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