जब अपनी आलोचना लगे कुकुर की भौंक ।
समझो जी दिन लद गए घिसी कलम की नोक ।
बड़ी उमर पे हो जाते डुकरा धीर गंभीर ।
एक डुकर ये देखिये हुए बाढ़ का नीर |
भाषा से संयम गया बदल गयी तासीर ।
नग्न हो रहे आप स्वयं चीर चीर कर चीर ।
पद पाने की आस में सिन्हा खींचे डोर ।
पद की दौड़ में पद गए मचा रहे अब शोर ।।
देख सिन्हा जी आपको याद आये शिशुपाल ।
करते रहिये धृष्टता जब तक चाहे गोपाल ।।
मिला नहीं जब भाव तो डुकरा मन मन रोये ।
खीझे चीखे गाली दे बची खुची खुद धोये ।
मति दुर्गति नष्ट करे चिर सिंचित सम्मान ।
वृद्ध अवस्था कष्टप्रद चाहे प्रीत अनुदान ।।

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