शनिवार, 7 अप्रैल 2018

चुटकियाँ


विपक्ष  -

सत्ता पाने की खातिर सारे,
जहर बहुत फैला देंगे |
अपने लालच की जद मे आकर,
मुल्क मे आग लगा देंगे ||


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मीडिया -


सच के पहलू से है गहरी अदावत अपनी |
इस उम्र मे क्या बदलें पुरानी आदत अपनी ||

कभी एक सच बोलें भी, तो किस मुँह से,
झूठ से बरसों रही है चाहत अपनी ||

ये न सोचो कि छोड़ा है, रूह को देने गवाही |
बेचकर खा गये कबकी हम गैरत अपनी ||


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कैबिनेट मंत्री -


अच्छी करें आलोचना भाषण में हैं दक्ष ।
सत्ता में बस नाम है, मन से अभी विपक्ष ।।

देखने में वृक्ष हैं, मगर है लंबी घास ।
कहाँ छाँव के आस में लगा रहे हो बांस ।

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फुदके मेंढक -


नतमस्तक हो इतराते थे,
शीश झुका के बैठे हैं ।
एक मुंह से दो बातें कहकर,
नाक कटाकर बैठे हैं ।।

लाल किले पर झंडा
राजकुंवर से चढ़वाऊंगा,
ऐसा दम्भ बताने वाले
टैक्स चुरा के बैठे हैं ।।


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पिद्दीगण -


भरी दुपहरी सपना देखे,
कैसे हो साकार?
दूर दूर तक कही नहीं है,
ऐसे कुछ आसार ।

अपनी बुद्धि दिखाएँ बबुआ,
नित दिन बारम्बार ।
खूब रटें रट रट रगड़ें,
रपटें पर हर बार ।

चाहे तो बन जाएँ हरकुलिस,
कौन करे इनकार ?
मगर देश में ऐसी प्रधानी,
हमें नहीं स्वीकार ।


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निराश समर्थक -


सरकती जाए है ये सरकार...आहिस्ता आहिस्ता
टूटता जा रहा है करार... आहिस्ता आहिस्ता

सेक्युलर होने लगे जब वो , तो हमसे कर लिया परदा,
तख्त यक्लख्त आया और दरबार ... आहिस्ता आहिस्ता

कई दशकों का जागा हूँ फॉलोवर्स अब तो सोने दो,
कभी फ़ुर्सत मे लेना पुकार ... आहिस्ता आहिस्ता

सवाल-ए-एक्शन पर उनको सभी का ख़ौफ़ है इतना ,
दुबके कर बैठ जाते हैं हर बार  आहिस्ता आहिस्ता

वो बेदर्दी से पलट जाएँ जब चाहें, और मैं कहूँ उनसे.
हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता सरकार आहिस्ता आहिस्ता

हमारे और तुम्हारी बात मे बस फ़र्क है इतना,
इधर तो सीधी-सीधी हैं, उधर की होती लच्छेदार आहिस्ता आहिस्ता ...


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